गैरसैंणः त्रिवेंद्र के फैसले से फिर जिंदा हुआ पहाड़ी राज्य का बुनियादी मकसद
प्रदीप थलवाल
देहरादून/गैरसैंणः ‘सबसे खतरनाक होता है/ हमारे सपनों का मर जाना….’ पाश की यह कविता हमें निराश नहीं होने देती। हमने सपना देखा था अपने राज्य का। संघर्ष हुआ शहदतें हुई। सही सपने को यथार्थ तक पहुंचाने के लिए एक लंबे जनसंघर्ष से गुजरे। जरा याद कीजियेगा वह दौर। जब अलग राज्य का सपना ऐसी कौम ने देखा था जो सदियों से विषम भौगोलिक परिस्थितियों की कैद में थी। धीरे-धीरे यह कौम इतिहास की अंधेरी कंदराओं से निकलकर अंतहीन सकड़ों पर अपनी नियति खुद तय करने चल पड़ी। एक शांत और सुप्त पड़े समाज ने अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए अनगिनत सपने देखे। सबके अलग-अलग सपने भले ही रहे हों लेकिन राज्य और राजधानी का सपना सबका काॅमन था। गैरसैंण सबकी भावनाओं में बस गया। लंबे जनसंघर्ष के बाद राज्य तो मिला लेकिन राजधानी का सवाल अधूरा रह गया। पहाड़ की राजधानी पहाड़ हो का सपना कहीं पीछे छूट गया नतीजतन पहाड़ी राज्य का बुनियादी मकसद ही खत्म हो गया। जिसके लिये लड़े वह मिलकर भी अधूरा रह गया। राज्य बना सरकारे बनी लेकिन राजधानी का मसला कोई सुलझाने को तैयार न हुआ। आखिरकार दो दशक बाद त्रिवेंद्र सिंह रावत ने हिम्मत जुटा कर प्रदेश की जनभावनाओं का सम्मान करते हुए गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित कर दिया। इस फैसले ने त्रिवेंद्र सिंह को इतिहास पुरूष बना दिया। इसके साथ ही उन्होंने खत्म हो चुके पहाड़ी राज्य के बुनियादी मकसद को फिर से जिंदा कर दिया। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने अपने ऐतिहासिक फैसले से उस सपने को साकार कर दिया जिसे वीर चंद्र सिंह गढ़वाली ने देखा और डी.डी.पंत व विपिन त्रिपाठी जैसे नेताओं ने सींचा था।
त्रिवेंद्र का ऐतिहासिक फैसला

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की कार्यशैली बताती है कि वह बड़े फैसले लेने से हिचकते नहीं हैं। भराड़ीसैंण में विधानसभा सत्र के दौरान उन्होंने गैरसैंण को लेकर स्थिति स्पष्ट कर दी। उन्होंने अपनी घोषणा में साफ कर दिया कि गैरसैंण अब ‘गैर’ नहीं बल्कि प्रदेश की ग्रीष्मकालीन राजधानी होगी। इसके साथ ही उन्होंने यह भी संकेत दे दिये कि वह यहीं तक रूकने वाले नहीं है। बल्कि भविष्य में गैरसैंण को प्रदेश की स्थाई राजधानी बनाने के लिए दृढ संकल्प हैं। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के इस फैसले से विपक्ष सन्न रह गया। कांग्रेस हमेशा से गैरसैंण के गीत गाती रही है। हालांकि तत्कालीन कंग्रेसी मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने गैरसैंण में विधानसभा सत्र आयोजित कर विधानसभा भवन की नींव रखी थी जिसे आगे बढ़ते हुए हरीश रावत ने विधानसभा भवन बना कर जतलाया कि वह पहाड़ी राजधानी के पक्ष में हैं लेकिन जिस तरह से त्रिवेंद्र सिंह रावत ने राजधानी को लेकर फैसला लिया वह उत्तराखंड की राजनीति में सबसे बड़ा और अहम कदम है। त्रिवेंद्र ने दिखा दिया कि वह उत्तराखंड की सियासत के नये भीष्म है।
इतिहास में गैरसैंण

गैरसैंण को राजधानी के तौर पर भले ही उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान मान्यता मिली हो लेकिन इससे पूर्व वीर चंद्र सिंह गढ़वाली ने गैरसैंण को भारत की ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने का सपना देखा। तब गढ़वाली ने देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के समक्ष एक प्रस्ताव रखा था कि वह दूधातोली से लगे गैरसैंण को देश की ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित करें। लेकिन नेहरू ने उनके इस अनुरोध पर ध्यान नहीं दिया। वहीं साठ के दशक में उत्तराखंड पृथक राज्य को लेकर आंदोलन जोर पकड़ने लगा। 1989 में डीडी पंत और विपिन चंद्र त्रिपाठी ने पर्वतीय जनमानस के बीच गैरसैंण की अलख जगाई। धीरे-धीरे गैरसैंण पर्वतीय समाज की भवना का केंद्र बन गया। आन्दोलनकारियों ने राजधानी के रूप में 25 जुलाई 1992 को गैरसैंण का औपचारिक उद्घाटन भी किया। इसके बाद आंदोलनकारियों ने तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार के मुखिया मुलायम सिंह को कौशिक समिति बनाने पर मजबूर किया। कौशिक समिति ने भी उत्तराखंडी समाज की भावनाओं का आदर कर राजधानी के तौर पर गैरसैंण पर अपनी मुहर लगा दी। राज्य बन्ने के बाद वर्ष 2012 में तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने गैरसैंण में कैबिनेट बैठक कर भराड़ीसैंण में विधानसभा भवन की नींव रखी। इसके बाद हरीश रावत ने अपने कार्यकाल में विधानसभा भवन तैयार किया और विधानसभा में हर बजट सत्र गैरसैंण में आयोजित करने का संकल्प पारित किया। इसके बाद प्रदेश में भाजपा सरकार बनी तो मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने साहस जुटा कर गैरसैंण को प्रदेश की ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने की घोषणा कर दशकों पुराने सपने को साकार कर दिया।
