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तेजी से बदल रहे हिमालय के पर्यावरण ने दिए खतरनाक संकेत, वैज्ञानिकों ने सूखे की जताई आशंका

हिमालय का पर्यावरण तेजी से बदल रहा है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी (एनआईएच) रुड़की के शोध में यह खुलासा हुआ है।

एनआईएच वैज्ञानिकों के मुताबिक, एक ओर जहां बीते 20 वर्षों में हिमालय में बारिश और बर्फबारी का समय बदल गया है, वहीं पश्चिमी विक्षोभ की संख्या में भी कमी आई है। यही नहीं हिमालय के ग्लेशियरों से झीलें बनने का सिलसिला भी शुरू हो गया है।

एनआईएच ने गंगोत्री में अपनी ऑब्जर्वेट्री लगाई है। एनआईएच के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. मनोहर अरोड़ा ने बताया कि 20 वर्षों के भीतर तेजी से हिमालय में पर्यावरणीय परिवर्तन आए हैं।

बर्फबारी होने और बर्फ टिकने का समय काफी कम

उन्होंने बताया कि बर्फबारी होने और बर्फ टिकने का समय काफी कम हो गया है। पहले दिसंबर से जनवरी माह में बर्फबारी होती थी और फरवरी में बर्फ पिघलती थी लेकिन अब फरवरी में बर्फ पड़ती है। यह बर्फ भी इतनी कम होती है कि इससे नदियों में सूखे की नौबत आ गई है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक, पश्चिमी विक्षोभ की संख्या में भी बीते 20 वर्षों में कमी आई है। पहले जहां 10 से 15 चक्र पश्चिमी विक्षोभ आते थे लेकिन अब इनकी संख्या पांच से छह रह गई है। मौसम के बिगड़े मिजाज के चलते ग्लेशियरों की सेहत पर बुरा असर पड़ रहा है। इससे झीलें बनने के सिलसिले को वैज्ञानिक चिंताजनक मान रहे हैं। पिछले साल भी गोमुख के ग्लेशियर के पिघलने के कारण झील बन गई थी। अब एनआईएच के वैज्ञानिकों की टीम गोमुख समेत अन्य ग्लेशियरों का अध्ययन में जुट गई है।

बढ़ेगा सूखा, बिगड़ेगा पर्यावरणीय संतुलन 
हिमालय का पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ने का असर दूरगामी होगा। एक ओर जहां इसका असर वन्य जीवों पर पड़ेगा तो दूसरी ओर पानी की कमी, नदियों के सूखना भी बढ़ जाएगा। वैज्ञानिक पहले ही अगले 50 वर्षों में पहाड़ों का तापमान दो से चार डिग्री बढ़ने का अनुमान जता चुके हैं।

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