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जानिए 2 जी घोटाले में कब, क्‍या हुआ

2-जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले में गुरुवार को सीबीआई की विशेष अदालत ने सबूतों के अभाव में सभी आरोपियों को बरी कर दिया। 6 साल तक चले ट्रायल के बाद कोर्ट मामले में पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा, द्रमुक सांसद कनिमोई और कई अन्य के भाग्य का फैसला होना था। अदालत ने सभी आरोपियों को बरी करने का एक लाइन का फैसला सुनाया। विशेष सीबीआई न्यायाधीश ओ पी सैनी यूपीए सरकार के समय हुए टूजी घोटाले में सीबीआई और ईडी द्वारा दर्ज अलग अलग मामलों की सुनवाई कर रहे थे।

2 जी घोटाले में कब, क्‍या हुआ

16 मई 2007: डीएमके नेता ए राजा को दूसरी बार दूरसंचार मंत्री नियुक्त किया गया।

25 अक्तूबर 2007: केंद्र सरकार ने मोबाइल सेवाओं के लिए टू-जी स्पेक्ट्रम की नीलामी की संभावनाओं को खारिज किया।

सितम्बर-अक्तूबर 2008: दूरसंचार कंपनियों को स्पेक्ट्रम लाइसेंस दिए गए।

15 नवंबर 2008: केंद्रीय सतर्कता आयोग ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट में खामियां पाईं और दूरसंचार मंत्रालय के कुछ अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की अनुशंसा की।

21 अक्तूबर 2009: सीबीआई ने टू-जी स्पेक्ट्रम मामले की जांच के लिए मामला दर्ज किया।

22 अक्तूबर 2009: मामले के सिलसिले में सीबीआई ने दूरसंचार विभाग के कार्यालयों पर छापेमारी की।

17 अक्तूबर 2010: भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने दूसरी पीढ़ी के मोबाइल फोन का लाइसेंस देने में दूरसंचार विभाग को कई नीतियों के उल्लंघन का दोषी पाया।

नवंबर 2010: दूरसंचार मंत्री ए राजा को हटाने की मांग को लेकर विपक्ष ने संसद की कार्यवाही ठप की।

14 नवम्बर 2010: राजा ने इस्तीफा दिया।

15 नवम्बर 2010: मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल को दूरसंचार मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार दिया गया।

नवम्बर 2010: टू जी स्पेक्ट्रम आवंटन की जांच के लिए जेपीसी गठित करने की मांग को लेकर संसद में गतिरोध जारी रहा।

13 दिसम्बर 2010: दूरसंचार विभाग ने उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश शिवराज वी पाटिल समिति को स्पेक्ट्रम आवंटन के नियमों एवं नीतियों को देखने के लिए अधिसूचित किया. इसे दूरसंचार मंत्री को रिपोर्ट सौंपने को कहा गया।

24 और 25 दिसम्बर 2010: राजा से सीबीआई ने पूछताछ की।

31 जनवरी 2011: राजा से सीबीआई ने तीसरी बार फिर पूछताछ की. एक सदस्यीय पाटिल समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंपी।

दो फरवरी 2011: टू-जी स्पेक्ट्रम मामले में राजा, पूर्व दूरसंचार सचिव सिद्धार्थ बेहुरा और राजा के पूर्व निजी सचिव आर के चंदोलिया को सीबीआई ने गिरफ्तार किया।

जानिए कैसे हुआ घोटाले का पर्दाफाश

22 नवंबर 2007: वित्त सचिव ने 2001 की दरों पर लाइसेंस/2जी स्पेक्ट्रम आवंटन पर विरोध दर्ज कराया।

29 नवंबर 2007: दूरसंचार विभाग के सचिव ने इसे मानने से इनकार कर दिया. नीलामी के विरोध में 2003 के राजग सरकार के कैबिनेट फैसले और ट्राइ की सिफारिशों का हवाला दिया।

26 दिसंबर 2007: ए. राजा ने स्पेक्ट्रम के मूल्य को लेकर मंत्री समूह के अध्यक्ष प्रणब मुखर्जी और महाधिवक्ता गुलाम वाहनवती के साथ चर्चा का हवाला देते हुए प्रधानमंत्री को पत्र लिखा. उन्होंने बताया कि पहले आओ-पहले पाओ की परिभाषा को वाहनवती ने मंजूरी दे दी है।

26 दिसंबर 2007: प्रणब मुखर्जी ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा लेकिन उन्होंने उसमें राजा के साथ अपनी बैठक का कोई जिक्र नहीं किया।

3 जनवरी 2008: प्रधानमंत्री ने राजा के दिनांक 26 दिसंबर के पत्र की पावती दी।

10 जनवरी 2008: 15 कंपनियों को 121 लाइसेंसों के लिए आशय पत्र जारी किए गए।

15 जनवरी 2008: चिदंबरम ने प्रधानमंत्री को लिखा, राजा ने जो किया वह ‘अध्याय बंद’ है।

30 जनवरी 2008: राजा ने चिदंबरम के साथ ऑपरेटरों की संख्या और स्पेक्ट्रम ट्रेडिंग को सुरक्षित करने की जरूरत के बारे में चर्चा की।

4 जुलाई 2008: प्रधानमंत्री, चिदंबरम और राजा ने स्पेक्ट्रम शुल्क और 6.2 मेगाहर्ट्ज के परे कीमत पर चर्चा के लिए बैठक की।

23 सितंबर 2008: स्वान ने एतिसलात के साथ सौदा किया. एक महीने बाद ही यूनीटेक ने टेलीनॉर के साथ सौदा कर लिया।

28 मई 2009: यूपीए के दूसरे कार्यकाल में राजा को फिर दूरसंचार मंत्री बना दिया गया।

21 अक्तूबर 2009: सीबाआई ने एफआइआर दर्ज की।

14 नवंबर 2010: राजा ने इस्तीफा दिया।

16 नवंबर 2010: सीएजी रिपोर्ट में 2जी घोटाले में 1.76 लाख करोड़ का नुकसान आंका गया।

18 नवंबर 2010: ट्राई ने 121 लाइसेंसों में से 69 रद्द करने की सिफारिश की।

फरवरी 2011: राजा, पूर्व दूरसंचार सचिव सिद्धार्थ बेहरा और राजा के निजी सचिव आर.के. चंदोलिया गिरफ्तार कर लिए गए।

2 अप्रैल, 2011: सीबीआई ने पहला आरोपपत्र दाखिल किया।

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