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बेपटरी हुआ मेक इन इंडिया, मंत्रालयों के अपने झगड़ों से मेक इन इंडिया को हो रहा नुकसान%!%!%!%!%!%!%!%!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पसंदीदा कार्यक्रम ‘मेक इन इंडिया’ को दिसंबर में उस समय झटका लगा जब 20 अरब रुपये की वैश्विक निविदा के जरिये पटरियों को खरीदने की योजना को लेकर सरकार के दो अहम विभागों इस्पात और रेलवे मंत्रालयों में मतभेद उभर आए। दुनियाभर की कई नामी गिरामी कंपनियों ने इस निविदा में हिस्सा लिया था। इनमें सुमिमोता कॉर्पोरेशन, एंगेंग ग्रुप इंटरनैशनल, वॉस्टेपलपाइन शाइनन, ईस्ट मेटल्स, सीआरएम हॉन्ग कॉन्ग, ब्रिटिश स्टील फ्रांस रेल, अटलांटिक स्टील और जिंदल स्टील ऐंड पावर लिमिटेड (जेएसपीएल) शामिल हैं।

इस वैश्विक निविदा की अहमियत यह है कि तीन दशक में पहली बार रेलवे ने अपनी खरीद नीति में बदलाव किया है। इससे पहले पटरियों की खरीद में सरकारी कंपनी भारतीय इस्पात प्राधिकरण (सेल) की दबदबा था। इसलिए इसमें आश्चर्य नहीं है कि इस्पात मंत्रालय ने इस वैश्विक निविदा का कड़ा विरोध किया। साथ ही मेक इन इंडिया पहल से भटकने पर प्रधानमंत्री कार्यालय ने भी रेल मंत्रालय को सावधान किया है।  निविदा खुलने से कई दिन पहले प्रधानमंत्री कार्यालय ने 10 दिसंबर को सभी विभागों को घरेलू विनिर्माताओं को प्राथमिकता देने और उनके हितों का संरक्षण करने को कहा। मोदी के प्रधान सचिव नृपेन्द्र मिश्रा ने एक पत्र में लिखा, ‘यह परेशानी की बात है कि कई विभागों ने इसके व्यापक संदेश को नहीं समझा है।’

तो फिर आंतरिक स्तर पर मजबूत विरोध के बावजूद रेल मंत्रालय ने निविदा की प्रक्रिया को आगे क्यों बढ़ाया? जबसे पीयूष गोयल में रेल मंत्रालय का कार्यभार संभाला है तबसे सुरक्षा बढ़ाने के लिए पटरियों को नए सिरे से बिछाने का काम तेज हो गया है। मंत्रालय का आंतरिक लक्ष्य अगले दो साल में ट्रेनों के पटरियों से उतरने की घटनाओं में 50 फीसदी कमी करना है। सुरक्षा सुधारने के लिए रेलवे अगले कुछ वर्षों में कम से कम 8,000 किमी पुरानी पटरियों को बदलेगा। इस पर करीब 100 अरब रुपये खर्च आने का अनुमान है।

कई दुर्घटनाओं के बाद रेलवे के आधुनिकीकरण की रफ्तार तेज हो गई है और पटरियों को बदलने का कार्यक्रम भी इसी का हिस्सा है। रेल मंत्रालय की योजना अगले 5 साल में 8.5 लाख करोड़ रुपये निवेश की है जिसमें से 1.2 लाख करोड़ रुपये सुरक्षा पर खर्च किए जाएंगे। रेलवे के एक अधिकारी ने कहा, ‘हमें तुरंत पटरियों की जरूरत है क्योंकि अगले दो वर्ष में पटरियों को बदलने के लक्ष्य को 2,500 किमी से बढ़ाकर 4,000 किमी किया जा रहा है। वर्ष 2017-18 और 2018-19 के लिए हमें क्रमश: 14 लाख टन और 17 लाख टन पटरियों की जरूरत पड़ेगी। सेल इतनी पटरियों की आपूर्ति नहीं कर सकता है, इसलिए हमें वैश्विक निविदा जारी करनी पड़ी।’

इस्पात मंत्रालय का मानना था कि वैश्विक निविदा की जरूरत नहीं थी क्योंकि सेलने 950,000 टन आपूर्ति का वादा किया है और जेएसपीएल दिसंबर 2017 से मार्च 2018 तक 200,000 टन पटरियों की आपूर्ति करने में सक्षम है। इतना ही नहीं स्थायी समिति ने निविदा को इस शर्त पर एक बार की छूट दी है कि मेक इन इंडिया कार्यक्रम को बढ़ावा देने के लिए 20 फीसदी खरीद घरेलू उत्पादकों से की जाएगी।

मंत्रालय ने पहले 717,000 टन पटरियों की खरीद के लिए निविदा जारी की थी लेकिन सेल और जेएसपीएल के आश्वासन के बाद इसे घटाकर 487,000 टन कर दिया गया। रेलवे के सुरक्षा कार्य की गति रफ्तार पकड़ रही है और इसका अंदाजा गोयल के हाल के बयान से लगाया जा सकता है। उन्होंने कहा, ‘रेलवे ने केवल दिसंबर में 476 किमी पटरियों को बदला है जो अब तक का रिकॉर्ड है। इसका मासिक औसत 240 किमी है। हम उम्मीद कर रहे हैं कि 2017-18 में 3,500 किमी पटरी बदली जाएगी।’

दिलचस्प है कि रेलवे बोर्ड के पटरी विभाग के कार्यकारी निदेशक पी अवस्थी ने 18 दिसंबर को इस्पात सचिव को एक पत्र लिखकर कहा कि पटरियों के निर्माण की प्रक्रिया और प्रौद्योगिकी जटिल है और इसे सामान्य रेलस उत्पादों की तरह नहीं माना जाना चाहिए। उन्होंने लिखा, ‘सेल का लंबा अनुभव होने के बावजूद उसके 15 फीसदी ऑर्डर निरस्त हो जाते हैं। इसलिए सुरक्षा पहलुओं को देखते हुए यह जरूरी है कि वेंडर एक स्थापित विनिर्माता हो।’ 

रेलवे नई पटरियां बिछाने और पुरानी पटरियों को बदलने के लिए अभी केवल सेल के भिलाई संयंत्र से ही पटरियों की खरीद कर रही है। इस संयंत्र से रेलवे को औसतन 700,000-800,000 टन पटरियों की आपूर्ति होती है। सेल के ऑर्डर के निरस्तीकरण के बारे में पूछने पर एक अन्य अधिकारी ने कहा कि सेल ने इस वित्त वर्ष के दौरान 950,000 टन का आश्वासन दिया है जिसमें निरस्त ऑर्डर भी शामिल है।  एक अधिकारी ने कहा, ‘हम वह करने की कोशिश कर रहे हैं जो पिछली कई सरकारों ने वर्षों तक नहीं किया। अगर इन उपायों को नहीं बढ़ाया गया तो इससे रेलवे की विश्वसनीयता और पटरियों का नुकसान होगा।’

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