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माखनलाल चतुर्वेदी के काव्य में राष्ट्रीय चेतना

“जाओ, जाओ, जाओ प्रभु को पहुँचाओ स्वदेश संदेश।

गोली से मारे जाते हैं भारतवासी हे सर्वेश ॥“

ये पंक्तियाँ सन १९२० में जालियांवाला हत्याकाण्ड के संदर्भ में शहीदों को याद करते हुए माखनलाल चतुर्वेदी जी लिखते हैं। मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन और रामधारी सिंह दिनकर आदि हिन्दी राष्ट्रीय काव्यधारा के प्रमुख स्तम्भ हैं। माखनलाल चतुर्वेदी जी समसामयिक युगदृष्टा एवं राष्ट्रीय स्वर को उजागर करनेवाले सच्चे राष्ट्रीय कवि थे। उनके काव्य में अनन्य देश-प्रेम और निश्चल समर्पण की भावना है। यही देश-प्रेम कालांतर में उनके जीवन का एक शक्तिशाली स्वर बन गया। ‘पुष्प की अभि‍लाषा’ उनकी सर्वाधि‍क चर्चित कविता रही और इसके लिए उन्हें सागर विश्वविद्यालय द्वारा डी.लिट. की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया। इसके अलावा अपने काव्य संग्रह ‘हिम तरंगि‍णी’ के लिए उन्हें सन् 1955 में ‘साहित्य अकादमी’ पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। देश-प्रेम से ओत-प्रोत उनकी कविता ’पुष्प की अभिलाषा’ को कोई कभी नहीं भूल सकता –

“ चाह नहीं मैं सुरबाला केगहनों में गूँथा जाऊँ
चाह नहींप्रेमी-माला मेंबिंध प्यारी को ललचाऊँ
चाह नहींसम्राटों के शवपर हे हरिडाला जाऊँ
चाह नहींदेवों के सिर परचढ़ू भाग्य पर इठलाऊँ
मुझे तोड़ लेना वनमालीउस पथ पर देना तुम फेंक
मातृभूमि पर शीश चढ़ानेजिस पथ जावें वीर अनेक ॥“

माखनलाल चतुर्वेदी और अन्य नेता आजादी के लिए वे बहुत चिंतित थे. लगातार इस दिशा में चिंतन-मनन करते रहे। इसी कारण 1908 में हिन्द केसरी में आयोजित ’राष्ट्रीय आंदोलन और बहिष्का’ निबंध प्रतियोगिता में उनको पहला स्थान मिला। ’मेरा भारत देश महान’ के अनुसार माखनलाल जी हमेशा अपने देश को महान ही समझा है। अपने देश और गरिमामयी संस्कृति का वर्णन अपनी कविता ’प्यारे भारत देश’ में इस प्रकार किया-

“प्यारे भारत देश
गगन-गगन तेरा यश फहरा
पवन-पवन तेरा बल गहरा
क्षिति-जल-नभ पर डाल हिंडोले
चरण-चरण संचरण सुनहरा

ओ ऋषियों के त्वेष
प्यारे भारत देश॥“

माखनलाल चतुर्वेदी हिन्दी साहित्य में ’एक भारतीय आत्मा’ के नाम से प्रख्यात हैं। स्वतंत्रता संग्राम की ओर आकर्षित होकर गांधीवाद से प्रभावित हो गए। स्वतंत्रता-संग्राम के सक्रिय सेनानी होने के कारण कई बार इनको जेल भी जाना पडा। इनकी कविता में अनुभूति, भावना, आदर्श, त्याग, राष्ट्र-प्रेम, समाज-कल्याण आदि का बडा महत्व है। महात्मा गांधी जी की सत्य-अहिंसा, तिलक की बलिदान भावना और कविवर रवींद्र की मानवपूजा आदि इनके काव्य के आधार-तत्व हैं।

उन्होंने अपनी पत्रकारिता के माध्यम से ब्रिटिश शासन के खि‍लाफ अपनी आवाज़ को बुलंद किया और युवाओं से देश की स्वतंत्रता के लिए मर-मिटने का आह्वान किया। उनकी रचनाओं में सशक्त भावनाओं को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। पत्रकारिता के क्षेत्र में एक नया बदलाव माखनलाल जी से ही प्रारंभ हुआ है।

माखनलाल चतुर्वेदी जी का जीवन असामान्य था, उनका संपूर्ण जीवन ही देश के लिए समर्पित था। जैसे स्वामी विवेकानंद को एक कोरा सन्यासी, महात्मा गाँधी जी को कोरा राजनेता कहकर टाला नहीं जा सकता, ठीक उसी प्रकार पंडित माखनलाल चतुर्वेदी को कोरा साहित्यकार या पत्रकार कह कर नहीं टाला जा सकता है। पंडित माखनलाल चतुर्वेदी का अदभूत व्यक्तित्व स्वतंत्र सेनानी, विशुद्ध साहित्यकार, क्रन्तिकारी कवि एवं निर्भीक पत्रकार की मिली-जुली रेखाओं से बनता है। वे कर्म से योद्धा, बुद्धि से चिन्तक, दिल से कवि स्वाभाव से संत और अद्भूत बेजोड़ प्रवक्ता थे। उनका सम्पूर्ण जीवन और चिंतन भारतीय समाज की रक्षा करने और संवारने के सन्दर्भ में अभिव्यक्त हुआ है। माखनलाल जी का जीवन जन-साधारण-सा नहीं था। उनके व्यक्तित्व के विकास के कारण सामान्य परिवार में जन्म और संघर्षपूर्ण जीवन था। वे अपने संघर्षरत जीवन के बारे में कहते हैं कि-

सूली का पथ ही सीखा हूँसुविधा सदा बचाता आया।

मैं बलि पथ का अंगारा हूँजीवन ज्वाला जलाता आया॥”

माखनलाल एक कुशल वक्ता भी थे। जब वे बोलते थे तो लोग शांत हो जाते थे। उनके वक्तृत्व कला पर महात्मा गांधी भी मुग्ध थे। उन्होंने एक बार टिप्पणी की थी-हम सब लोग तो बात करते हैबोलना तो माखनलाल जी ही जानते है।’ सन् 1933 में मध्यप्रदेश में महात्मा गांधी जी के हरिजन दौरे के समय बाबई पहुंचे थे। तब उन्होंने कहा था- मैं बाबई जैसे छोटे स्थान पर इसलिए जा रहा हूँ क्योंकि वह माखनलाल जी काजन्म स्थान है। जिस भूमि ने माखनलाल जी को जन्म दिया हैउसी भूमि को मैं सम्मान देना चाहता हूं। माखनलाल जी अपने से भी ज्यादा हमेशा देश को ही चाहा है, प्राणों की चिन्ता तो उन्हें कभी थी ही नहीं। इसलिए उनकी ’कैसी है पहिचान तुम्हारी’ कविता की पंक्तियाँ याद आती हैं –

कैसी है पहिचान तुम्हारी,
राह भूलने पर मिलते हो!

प्राणकौन से स्वप्न दिख गये,
जो बलि के फूलों खिलते हो।
कैसी है पहिचान तुम्हारी,
राह भूलने पर मिलते हो॥

‘एक भारतीय आत्मा’ नाम माखनलाल जी के लिए अत्यंत योग्य उपनाम है। क्योंकि ‘एक भारतीय आत्मा’ उस व्यक्ति का नाम है जिसने भारत और भारतीयता की अस्मिता को पूरी तरह आत्मसात कर उसकी रक्षा में अपनी रचनाधर्मिता को समर्पित करनें में विश्वास किया। ‘एक भारतीय आत्मा’ ऐसा नाम है, जिसने भारत की परतंत्रता को स्वीकार करने के बजाय उसकी स्वतंत्रता के लिए कारावास का कष्ट झेलने में भी सुख का अनुभव किया। भारतीय आत्मा शब्द का संकेत है कि भारत मेरा देश है और मैं इसकी आत्मा हूं। यह एक ऐसा उपनाम है जो कवि के मानस में व्याप्त भारत देश पर अपने नैसर्गिक अधिकार को दर्शाता है। सच में माखनलाल जी में देश-प्रेम कूट-कूट कर भरा हुआ था, अपने आप को और देश के सभी जवानों को सिपाही मानते थे। उनकी ’सिपाही’ कविता की कुछ पंक्तियाँ देखेंगे तो देश-प्रेम उमढ आयेगा-

बोल अरे सेनापति मेरे!
मन की घुंडी खोल,
जलथलनभहिल-डुल जाने दे,
तू किंचित् मत डोल !
दे हथियार या कि मत दे तू
पर तू कर हुंकार,
ज्ञातों को मतअज्ञातों को,
तू इस बार पुकार!
धीरज रोगप्रतीक्षा चिन्ता,
सपने बनें तबाही,
कह `तैयार‘! द्वार खुलने दे,
मैं हूँ एक सिपाही !

माखनलाल जी के काव्य में बलिदान, समर्पण, विद्रोह, गांधीवादी दृष्टि, वीर-पूजा तथा प्रेम-आराधना के स्वर प्रमुख है। देश की स्वतंत्रता के लिए कृतसंकल्प लोकमान्य बालगंगाधार तिलक से दादा माखनलाल प्रभावित थे। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी के संपर्क में आने के बाद वे स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। वे कई बार जेल गए। बिलासपुर में सन् 1922 में भड़काऊ भाषण देने के लिए उन्हें जेल जाना पड़ा। इसी दौरान उन्होंने बिलासपुर जेल में ‘पुष्प की अभिलाषा’ कविता की रचना की। उन्होंने अपनी रचना से जनमानस को स्वतंत्रता की लड़ाई के लिए उत्प्रेरित किया। कर्मवीर में उनके द्वारा लिखे गए लेखों ने अंग्रेज सरकार की नींद उड़ा दी थी। माखनलाल जी का मानना था कि विदेशी शोषण और अत्याचार के खिलाफ जिस व्यक्ति के हृदय में ज्वाला न धधके तो वो कैसा भारतीय है? उसका जीवन ही निरर्थक है, वह मृत सदृश है-

“द्वार बलि का खोल

चल भूडोल कर दे

एक हिम-गिरि एक सिर

का मोल कर दें,

मसलकर, अपने इरादों-सी, उठाकर,

दो हथैली हैं कि

पृथ्वी गोल कर दें

रक्त है या है नसों में क्षुद्र पानी।

जांच कर, तू सीस दे-देकर जवानी।“

भाषा और शैली की दृष्टि से माखनलाल पर आरोप किया जाता है कि उनकी भाषा बड़ी बेड़ौल है। उसमें कहीं-कहीं व्याकरण की अवेहना की गयी है। भाषा-शिल्प के प्रति माखनलाल जी बहुत सचेष्ट रहे हैं। उनके प्रयोग सामान्य स्वीकरण भले ही न पायें, उनकी मौलिकता में सन्देह नहीं किया जा सकता। चतुर्वेदी जी एक लोकप्रिय कवि, एक दिग्गज पत्रकार और हिंदी के कुशल लेखक थे।

माखनलाल चतुर्वेदी सरल भाषा और ओजपूर्ण भावनाओं के अनूठे हिन्दी रचनाकार थे। राष्ट्रीयता माखन लाल चतुर्वेदी के काव्य का कलेवर है तथा रहस्यात्मक प्रेम उसकी आत्मा है। 30 जनवरी सन् 1968 को साहित्य जगत का यह सितारा संसार से सदा के लिए ओझल हो गया। अब तो उनकी स्मृति ही शेष है। दादा माखनलाल जीवनभर पतझड़ झेलते रहे, पर दूसरों के लिए हमेशा बसंत की कामना की। वे एक ऐसे क्रांतिदृष्टा थे, जिन्होंने जीवन के हर क्षेत्र में संघर्ष किया। ऐसे ‘एक भारतीय आत्मा’ को शत् शत् नमन करते हुए आइए उनकी कविता ’दीप से दीप जले’ के अनुसार देश-प्रेम का, मानवता का दीप जलाएँ-

“ सुलग-सुलग री जोत दीप से दीप मिलें
कर-कंकण बज उठे
, भूमि पर प्राण फलें।

युग के दीप नए मानव, मानवी ढलें
सुलग-सुलग री जोत! दीप से दीप जलें

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