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पेट्रोल-डीजल जल्द आएं जीएसटी के दायरे में, उद्योग संगठनों ने की उत्पाद शुल्क में कटौती की मांग तेज

तेल की बढ़ती कीमतों को देश के आर्थिक विकास की राह का रोड़ा बताते हुए भारतीय कारोबार जगत ने सोमवार को केंद्र सरकार से पेट्रोल व डीजल पर उत्पाद शुल्क में तत्काल कटौती का आग्रह किया। उद्योग संगठनों फिक्की तथा एसोचैम ने बढ़ती कीमतों के दीर्घकालिक समाधान के रूप में वाहन ईंधन को वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के दायरे में लाने की भी वकालत की। संगठनों के मुताबिक, तेल की बढ़ती कीमतें तथा रुपये में कमजोरी देश के आयात बिल में उल्लेखनीय रूप से इजाफा करेगा और मुद्रास्फीति पर इसका व्यापक असर पडे़गा।

रुपये के कमजोर होने से पड़ेगा दबाव
फिक्की के प्रेसिडेंट राशेष शाह ने बताया कि तेल की वैश्विक कीमतों में एक बार फिर तेजी आने तथा रुपये में लगातार आ रही कमजोरी से महंगाई बढ़ने, उच्च व्यापार घाटा व भुगतान संतुलन पर दबाव का खतरा एक बार फिर बढ़ गया है।  उन्होंने कहा कि कमजोर होता रुपया आयात बिल पर दबाव में और बढ़ोतरी करेगा, जिससे मौद्रिक नीति समीक्षा के दौरान मुख्य ब्याज दरें बढ़ने का जोखिम पैदा होता है, जिसके परिणामस्वरूप निजी निवेश के विकास पर असर पड़ेगा।

विकास की राह में बनेगी रोड़ा
शाह ने कहा कि ऐसे वक्त में जब भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी की राह पर है, तेल की बढ़ती कीमतें एक बार फिर देश की अर्थव्यवस्था के विकास की राह के लिए रोड़ा बन गई है। उन्होंने कहा कि मुद्दे के समाधान के लिए अगर अतिशीघ्र कदम नहीं उठाया गया, तो आर्थिक विकास एक बार फिर बाधा की राह पर अग्रसर हो जाएगा। सरकार द्वारा तत्काल उठाए जाने वाले सबसे महत्वपूर्ण कदम में ईंधन पर उत्पाद शुल्क में कटौती शामिल है।

ईंधन को जीएसटी में लाना स्थायी समाधान 
शाह ने यह भी कहा कि आगे चलकर केंद्र सरकार को पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाने के लिए राज्यों के साथ मिलकर काम करना चाहिए। एसोचैम के सचिव जनरल डीएस रावत ने कहा कि पेट्रोल तथा डीजल पर उत्पाद शुल्क में कटौती से उपभोक्ताओं को अस्थायी राहत मिल सकती है, हालांकि स्थायी समाधान ईंधन को जीएसटी के दायरे में लाना ही है, जो तभी संभव है, जब केंद्र तथा राज्य साथ मिलकर ईंधन पर अपनी निर्भरता में उल्लेखनीय कमी लाएं।

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