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सूर्य ग्रहण 2018: जानें कैसे लगता है सूरज पर ग्रहण, क्या है आंशिक ग्रहण

सूर्यग्रहण एक ऐसी खगोलीय घटना है जब सूर्य और पृथ्वी के बीच चंद्रमा आ जाता है। ऐसा होने पर पृथ्वी के कुछ हिस्सों पर चंद्रमा की परछाईं पड़ने लगती है और सूर्य पर काला धब्बा दिखाई पड़ने लगता है। इसी तरह, चंद्रग्रहण भी होता है। पहले जब खगोल विज्ञान का विकास नहीं हुआ था तो माना जाता था कि ये ऐसी शक्तियों के चलते होता है जो अशुभ परिणाम देने वाली होती हैं। मध्य युग तक जिसे यूरोप में अंधकार का काल कहा जाता है, ग्रहण को लेकर यही धारणा प्रचलित रही। आगे चल कर जब ब्रूनो और गैलीलियो जैसे खगोलविदों ने ग्रहों की गति को समझने की कोशिश की तो इसके वैज्ञानिक कारण सामने आए। बावजूद, सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में ग्रहण को लेकर लोगों में एक विशेष उत्सुकता का भाव रहता है। प्रकृति में होने वाली यह परिघटना आम नहीं, विशिष्ट होती है, क्योंकि इसका संयोग हमेशा नहीं बनता।

ऐसे मौके पर दुनिया भर के खगोलविद् जहां तरह-तरह के प्रयोग करते हैं, वहीं आम लोग भी इसे लेकर बहुत उत्सुकता से भरे होते हैं। साथ ही, इसका धार्मिक महत्व भी है। सूर्यग्रहण हो परिभ्रमण के चक्र में आने वाला व्यवधान ही ग्रहण का कारण बनता है। जब सूर्य और पृथ्वी के बीच में चंद्रमा आ जाता है तो सूर्य की चमकती सतह चंद्रमा के कारण दिखाई नहीं पड़ती है। सूर्यग्रहण आंशिक और पूर्ण होता है। चंद्रमा के सूर्य और पृथ्वी के बीच में आ जाने के कारण जब सूर्य का एक हिस्सा छिप जाता है तो उसे आंशिक सूर्यग्रहण कहा जाता है। लेकिन जब सूर्य पूरी तरह से चंद्रमा के पीछे छिप जाता है तो उसे पूर्ण सूर्यग्रहण कहा जाता है।

पूर्ण सूर्य ग्रहण अमावस्या को ही होता है। सूर्य और चंद्रमा की राशियों से कमोबेश दुनिया की हर सभ्यता में लोगों का जीवन और भाग्य जुड़ा माना गया है। यही कारण है कि माना जाता है कि हर सूर्यग्रहण लोगों के जीवन पर असर डालता है। इसलिए इस मौके पर पवित्र नदियों में स्नान कर दान-दक्षिणा देने की परंपरा है, ताकि बुरे ग्रहों का प्रभाव नहीं पड़े सके। ऐसी मान्यता है कि राहु और केतु नाम के दो असुर सूर्य और चंद्रमा को अपना ग्रास बना लेते हैं और इसका असर अच्छा नहीं होता। इसलिए ग्रहण के समय कुछ भी नहीं खाना-पीना चाहिए और न ही मल-मूत्र का विसर्जन करना चाहिए।

इस वर्ष 15 फरवरी को पहला सूर्यग्रहण लगने वाला है, लेकिन कहा जा रहा है कि यह भारत में नहीं दिखेगा। वैसे, इस साल तीन बार सूर्यग्रहण लगने का योग बन रहा है। ज्योतिष की दृष्टि से यह सूर्यग्रहण बुरे प्रभाव वाला माना जा रहा है। ज्योतिषियों का कहना है कि भले ही यह सूर्यग्रहण भारत में न दिखे, पर इसके कुछ बुरे प्रभाव सामने आ सकते हैं। इससे देश के कुछ हिस्सों में भूकंप आदि की स्थितियां बन सकती हैं।
13 फरवरी को सूर्य मकर राशि से कुंभ राशि में अपना स्थान परिवर्तित कर रहा है। इसके ठीक बाद ही सूर्यग्रहण होगा। यद्यपि यह आंशिक होगा, फिर भी इसका सभी राशियों पर कुछ न कुछ असर देखने को मिलेगा। यह ग्रहण भारतीय समय के मुताबिक, 15 फरवरी को रात 12.25 पर शुरू होगा और सुबह चार बजे तक चलेगा। ज्योतिषियों का मानना है कि इसके कुछ बुरे प्रभाव सामने आ सकते हैं।

यह आंशिक सूर्यग्रहण अंटार्कटिका में करीब दो घंटे से भी कम समय तक देखा जा सकेगा। सूर्यग्रहण मुख्य तौर पर दक्षिण अमेरिकी देशों में ही देखा जा सकेगा, पर वहां भी यह बहुत लंबे समय तक नहीं दिखेगा। उरुग्वे, अर्जेंटीना और दक्षिण ब्राजील में भी यह दिखेगा, पर ज्यादा समय तक नहीं। हर साल होने वाले सूर्यग्रहणों की संख्या में अंतर होता है, पर खगोलविदों का मानना है कि हर छह महीने के बाद आंशिक सूर्यग्रहण होता ही है। इसके पहले आंशिक सूर्यग्रहण 13 सितंबर, 2015 को हुआ था। ये कहा जा रहा है कि दूसरा सूर्यग्रहण इस साल 13 जुलाई को ऑस्ट्रेलिया के दक्षिणी तट पर देखा जा सकता है। पर खगोलविदों का कहना है कि जरूरी नहीं कि यह देखा ही जा सके। हो सकता है कि यह ग्रहण इतना आंशिक हो दिखे ही नहीं

बहरहाल, इस सूर्यग्रहण को नंगी आंखों से देखना खतरे से खाली नहीं हो सकता है, भले ही यह आंशिक सूर्यग्रहण है। वैज्ञानिकों का कहना है कि बिना सुरक्षा उपाय किए सूर्यग्रहण देखने से आंखों की रोशनी तात्कालिक या स्थाई रूप से भी जा सकती है। साथ ही, यह दिमाग के नर्व्स पर भी बुरा असर डाल सकता है।

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