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उत्तराखंड: सातवीं की आकांक्षा ने PM मोदी को लिखी ‘मन की बात

त्तराखंड राज्य आंदोलन जब शुरू हुआ, तभी ये मांग थी कि गढ़वाल और कुमाऊं मंडल के बीचों बीच स्थित गैरसैंण को प्रदेश की राजधानी बनाया जाएगा ताकि पूरे प्रदेश का बराबर विकास हो सके। मगर जैसे ही राज्य अस्तित्व में आया तो पूरी राजनीति देहरादून में ही सिमट कर रह गई।17 साल बीत चुके हैं और आज भी उत्तराखंड की स्थाई राजधानी नहीं बन पाई है।

इतना जरूर हुआ है कि पहाड़ की राजनीति कर रहे प्रदेश के अधिकांश छोटे-बड़े नेताओं ने अपना ‘स्थाई’ आशियाना देहरादून में बना लिया जो प्रदेश की ‘अस्थाई राजधानी’ के तौर पर जाना जाता है।

7वीं की छात्रा ने लिखी पीएम को चिट्ठी

गैरसैंण को राजधानी बनाने की मांग को लेकर आंदोलनरत आंदोलनकारियों की फेहरिस्त में एक नाम ऐसा जुड़ गया जो किसी राजनीति से प्रेरित नहीं बल्कि विकास के लिए एक नई जंग छेड़ती सातवीं कक्षा में पढ़ रही एक बेटी है, जिसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बेटियों के प्रति उनका फर्ज याद दिलाने की एक कोशिश की है। राज्य के नेताओं से उम्मीद छोड़ चुकी इस बच्ची ने सीधे प्रधानमंत्री को ही एक चिट्ठी लिखी है, जिसके जवाब के इंतजार में इस बच्ची को नरेंद्र मोदी से ही उम्मीद है कि अब वही प्रदेश का विकास करेंगे।

पीएम से अपील, गैरसैंण को राजधानी बनाएं

कक्षा सात में पढ़ने वाली एक लड़की ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी भेजकर पहाड़ की ज्वलंत समस्याओं को उकेरने के साथ ही गैरसैंण को राजधानी बनाने की विनती की है। चिट्ठी में बच्ची ने शिक्षा, सड़क, स्वास्थ्य, प्राकृतिक आपदा, जंगली जानवरों के आतंक जैसी गंभीर सवालों को उठाया है।

स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं नहीं

रुद्रप्रयाग के नालंदा पब्लिक स्कूल में कक्षा सात में पढ़ रही 13 वर्षीय आकांक्षा नेगी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेजी चिट्ठी में लिखा है कि वो पहले अपने गांव के राजकीय प्राथमिक विद्यालय कनकचैरी (पोखठा) में पढ़ती थी, लेकिन वहां न तो छात्र थे और न ही अध्यापक। आकांक्षा ने बताया कि गांव में पढ़ने की अच्छी सुविधा नहीं थी। स्कूल भी दूर था, तो उसके पिता उन्हें रुद्रप्रयाग ले आए, जहां वो एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ रही है। आकांक्षा ने बताया कि वो जज बनना चाहती है।

आकांक्षा ने अपनी सहेली तनुजा के बारे में बताया कि वो पढ़ने में होशियार है, लेकिन जिस सरकारी स्कूल में वो पढ़ती है, वो गांव से बहुत दूर है। हाई स्कूल और भी दूर है। गांव के कई बच्चों को नदी पार करनी होती है. जब केदारनाथ आपदा आई थी तो झूला पुल बह गए थे। वो पुल अब भी नहीं बने हैं. गांव के बच्चे नदी पार करते समय ट्रॉली को भी हाथों से खींचते हैं। ट्राली खींचते समय कई बच्चों की उंगलियां कट जाती हैं।

आकांक्षा के मुताबिक गांवों के कई स्कूलों में टीचर और अन्य सुविधाएं नहीं हैं। कई स्कूलों में तो शौचालय और पीने का पानी भी नहीं है, जिससे लड़कियों को ज्यादा समस्या होती है। स्कूल दूर होने की वजह से गांव की लड़कियों को पढ़ाई छोड़नी पड़ती है क्योंकि माता-पिता अपनी बेटियों को गांव से अधिक दूर पढ़ने के लिए नहीं भेजते हैं।

बच्ची ने बताया, मुश्किल है पहाड़ पर जीवन

आकांक्षा ने बताया कि पहाड़ का जीवन बहुत कठिन होता है, वहां कई समस्याएं हैं. सड़क, स्वास्थ्य, जंगली जानवर का डर और उससे भी अधिक भूस्खलन, भूकंप और बाढ़ आने की आशंका। इस बच्ची ने बताया कि उसके पिता कहते हैं अगर गैरसैंण राज्य की राजधानी होती तो गांव में ये समस्याएं नहीं होती।

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